अपनी शान शौकत विलासिता के लिए पर्यावरण की जितनी उपेक्षा हुई है, शायद ही किसी की हुई हो।निधड़क हमने धरती,पेड़,नदिया इन सबका अति उपभोग किया यहां तक कि हमने उन मूक जानवरो की भी परवाह नही की जो यहाँ जी रहे थे । गरुण ,गिद्ध, बाज़ चील काला हिरण लगभग समाप्त हो चुके है गोरैया जैसी प्यारी चिड़िया समाप्ति की कगार में है पर हमें क्या मनुष्य का धरती पर एकाधिकार समझ कर हम इसको निचोडने से बाज नही आ रहे आज स्थिति यह है कि मनुष्य जाति स्वयं खतरे में आ गयी है आनी भी चाहिए कर्म का फल अवश्य मिलता है। अब वक्त नही बचा यदि पर्यावरण संतुलित नही रहा तो दुनियां की सारी भोग विलासिता सारे ज्ञान भंडार धरे के धरे रह जाएंगे हाथ लगेंगा तो केवल कष्ट, संकट और मृत्यु। आज सरकार के भरोसे बैठने का समय नही है खुद शुरुआत करनी पड़ेगी हाथ जोड़कर निवेदन है जाग जाओ वारना जाग नही पाओगे।
मत मांगो मुझसे ओ साथी ,प्रेम गीत मैं दे ना सकूँगा पायल की छनछन प्रेमी का ,आलिंगन मैं दे ना सकूँगा
लिख न पाता सांझ सुनहरी ,जो तुमको सहलाती है
लिख कैसे दूं प्रेम भाव , जब फटती मां की छाती है
अगली पंक्ति में देखये हमने धरती के साथ क्या किया
तृष्णा चढ़ी कपार हमें , भू उदर फाड़ कर बैठे हैं
नोच लिया जी भरने तक,फिर धुनि रमा के बैठे है
छुड़ा लिया हर एक निवाला , जो उसने संजोया था
फिर सूट बूट धर ज्ञानी का रंग चढ़ा के बैठे है
शत वर्ष जिया जो पीपल उसकी बोटी खा कर बैठे है
काट आम की डाल, खगों की रोटी खा कर बैठेहै
गरुण गिध्द कोयल गोरैया ,है सबका अधिकार यहाँ
क्यों हम न्याय प्रणेता उनके घर उजाड़ कर बैठे हैं
मानव का सर्वोपरि जीवन , वेद पुराणों ने माना
भाव भरे दी वाणी प्रभु ने, बृह्म को हमने पहचाना
क्या पशुत्व जीवन की हमने राह चुनी है ?पता नही
मां वसुधा की सेवा में तैयार कर दिया तहखाना
इस भयावह समस्या से हम कैसे निपट सकते है
सुखी टहनी पर मैं फिर से पत्ते नए लगाऊंगा
रूठी कोयल मेरे घर से फिर से उसे मनाऊंगा
नन्ही गोरैया के हिस्से का दाना बनवाऊंगा
पग पग चल कर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
रूठी कोयल मेरे घर से फिर से उसे मनाऊंगा
नन्ही गोरैया के हिस्से का दाना बनवाऊंगा
पग पग चल कर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
मैं भारत की नई उम्र हूँ , और उम्र का जोश नया
पर धरती के तपते तन में, जल थोड़ा जो शेष बचा
शेष बचे जल को मैं फिर अपार समुन्द्र बनाऊंगा
पग पग चलकर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
पर धरती के तपते तन में, जल थोड़ा जो शेष बचा
शेष बचे जल को मैं फिर अपार समुन्द्र बनाऊंगा
पग पग चलकर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
टहनी टूटे क्षमा मांगने वाली प्रथा चलाऊंगा
चली कुल्हाड़ी अगर तने में इंक़लाब चिल्लाऊंगा
आंदोलन की मांग उठी तो चिपको फिर से गाऊंगा
पग पग चलकर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
चली कुल्हाड़ी अगर तने में इंक़लाब चिल्लाऊंगा
आंदोलन की मांग उठी तो चिपको फिर से गाऊंगा
पग पग चलकर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
आप सबसे निवेदन है पर्यावरण बचाये।।





great vision shashi keep going
ReplyDeleteधन्यवाद पीयूष भाई बस आप का समर्थन चाहिए
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