समर
है धरा जो शुष्क सी ,तड़प रही जो खेद से |
वीर आज बढ़ चलो ,हरित कर दो स्वेद से |
प्रण लिए स्वप्राण में ,धरो करो में खड्ग तुम |
जीत की जो प्यास मन में ,व्यर्थ न करोगे तुम|
सामने जो रण पड़ा है , यज्ञ की वो भूमि है |
इस समर में प्रण करो की अंत तक लड़ोगे तुम ||
ये समर जो व्योम में हुंकार कर के छाया है |
ये समर जो शक्ति का प्रतीक बन के आया है |
इस समर को बेधना आसान न पार्थियों |
इस समर में रक्त स्वेद ने विजय को पाया है |
रीढ़ सीधी कर गति से इस गली बढोगे तुम |
इस समर में प्रण करो की अंत तक लड़ोगे तुम।।