Thursday, January 25, 2018

समर

समर

है धरा जो शुष्क सी ,तड़प रही जो खेद से |
वीर आज बढ़ चलो ,हरित कर दो स्वेद से |
प्रण लिए स्वप्राण में ,धरो करो में खड्ग तुम |
जीत की जो प्यास मन में ,व्यर्थ न करोगे तुम|
सामने जो रण पड़ा है , यज्ञ की वो भूमि है |
इस समर में प्रण करो की अंत तक लड़ोगे तुम ||

ये समर जो व्योम में हुंकार कर के छाया है |
ये समर जो शक्ति का प्रतीक बन के आया है |
इस समर को बेधना आसान न पार्थियों |
इस समर में रक्त स्वेद ने विजय को पाया है |
रीढ़ सीधी कर गति से इस गली बढोगे तुम |
इस समर में प्रण करो की अंत तक लड़ोगे तुम।।

अग्नि

अग्नि का विकराल रूप

एक दैत्य  देह विकराल कर के
हाथो मे अपने वो काल भर के
सन्मुख मेरे आ खड़ाहुआ
पर हाथ में मेरे नीर देख किंचित था शायद डरा हुआ|

पीत  वर्ण ओढ़े भुज पर
रख लाल तेज अपने मुख पर
पग धीरे धीरे बढ़ा रहा
नाजाने
अज्ञात मन क्या गला |रहा

न्यून त्रास मन में क्यों जागा
नीर उड़ेलकर मैं  क्यों भागा
प्रकृति की कसौटी थी या मेरा था अपराध
उस प्रलय का परिणाम मिला मुझे बड़ा अगाध||

अम्बु के स्पर्श मात्र यातुधान उछल पड़ा
क्रुद्ध होकर भयंकर जाने क्यों मचल पड़ा
विस्तार कलेवर करके अपना मुख कोपितहो भभक रहा
योजन भर का कर फैलाये पंख पसारे नभग रहा||

पीली चादर धारण करके तांडव में वो लींन हुआ
मुखसे अपने गगन चूमता कर विध्वंश विलीन हुआ
वृहद क्षेत्र के वन अरण्य को क्षण  भर में वो समां गया
सारे नीति नियम सुख दुःख वो पल भर में ही कमा गया


अल्प समय विध्वंश नदी का वह तो एक नावक था|
वह निसिचर कोई और नहीं एक क्रोधित कोपित पावक था

अग्नि अनल कृशानु हुताशन नाम अनेक पावक ज्वलन
धूमकेतु वैश्वानर शुचि साथ लिया ज्वाला दहन
क्रोध लेकर यदि खड़ा हुआ विंध्य बचा न विदर्भ
दहक़ रहाहै इसके कारन गर्तमें बसा भूगर्भ


अल्प समय विध्वंश नदी का वहतो एक नावकथा
वह निसिचर कोई और नहीं एक क्रोधित कोपित पावक था|

सैनिक

सैनिक

– हमारी मतृभूमि को बाहरी शत्रुओ से संरक्षण प्रदान करने वाले वीर फौजी हमेशा कड़वे प्रसंगो के बीच घिरे रहते
है
इस बात से भारती माँ व्याकुल होकर उस से पूछ बैठती है क्या तुझे भय नहीं लगता और क्रोध नहीं अाता की
तेरे ही लोग तुझ पर ऐसे कड़वे प्रसंग करते है
क्या और किस पर उपकार कर रहा है तू। तेरा उपकार कोई नहीं मानता
इस पर उस वीर ने बड़ी सुंदरता तथा सहजता से उत्तर दिया

भय डर त्रास का विनाश करते बढ़ रहा हूँ।
शक्ति क्षीण हो ना पाए विचार करके लड़ रहा हूँ।
आँन मातृभूमि की संभाल करके चढ़ रहा हूँ।
मृत्यु सन्मुख मिथ्या है विचार मन में मढ रहा हूँ।

उपकार नहीं भूमि का ऋण अदा करता हूँ
पीर ना पहुंचे देश को बस इसी बात से डरता हूँ। .

भय नहीं है मुझे मृत्यु की चीत्कार से
मुख धोये है मैंने मित्रो की रक्त धार से।
अश्रु न बहे मेरे नयन बड़े कठोर है
मृत्यु से डरू क्यों मै मृत्यु तो चहुओर है।
उपकार नहीं भूमि का ऋण अदा करता हूँ
पीर ना पहुंचे देश को बस इसी बात से डरता हूँ।

शत वीरों ने शीश चढ़ाये शत ने शव में कफ़न दिए
शत ने शीश हिमालय में महाकाल को दफ़न किये
कुछ बहरूपी सर्प गर्त से वफादार बन उमड़ पड़े
भारत तेरे टुकड़े होंगे सुन कर भी चुप रहे खड़े।
मैं तो हमेशा कड़वे प्रसंगो का विषपान करता हूँ
माँ तेरी मर्यादा पर सवाल न उठे बस इसी बात से डरता हूँ।
सीमा लांघेगा यदि इस माटी की उसका विध्वंश कर दूंगा।
प्रिय कितना भी हो मेरा सारे सम्बन्ध तज दूंगा
किन्तु घर में पल रहे नांग ही मन को कचोटते हैं
तेरा ही पय पीकर तेरी छाती में लोटते हैं
तू कितनी भोली है माँ जो पुँत्र समझ सब को गले लगाती हैं
व्यथा पीड़ा दुःख इनके देखकर तू क्यों अकुलाती है
ये सर्प बड़ा घातक है माँ विष फैन में रखकर रक्तपान करता है।
कही काट ना ले तुझे सोचकर पुत्र तेरा डरता है
प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती
ऐ दुष्टो इस देश में अगर तुम्हे बचने की क्षमता नहीं होती
मारे जाते तुम भी किसी आतंकी बारूदों से
फिर तुम्हे असहिष्णु दिखने वाली कोई जनता नहीं होती।
संभल जाओ विशधारियो जला दो विष अपना अंगार में
ऊँगली अगली बार उठी यदि माँ पर
सर कट जाएंगे भीषण नरसंहार में। .
भारत माता की जय , वन्दे मातरम।