Thursday, October 18, 2018
Sunday, October 7, 2018
सत्य का इंटरव्यू
भूमिका की ज्यादा आवश्यकता नहीं है बस इतना समझ लीजिए कि यह "सत्य बोल रहा है"
मेरा क्या? मैं तो चलता रहूंगा, शायद अकेला
तुम जाओ , छोड़ दो मेरा हाथ, रोक लो अपने कदम
तुम जाओ, जाने दो मुझे "अकेला"
तुम जाओ, किसी कुर्ते के पीछे वाले जमींदार के पास
मेरे नाम के कंगन गिरवी रख दो और उससे कुछ काले अक्षर ले लो
ठूंस लो उन्हें मुंह ह्रदय आत्मा की गहराइयों तक
चढ़ते जाओ फिर सफलता की सीढ़ियां, दम नहीं है किसी में रोक ले तुम्हें
मेरा क्या है, मैं तो चलता रहूंगा ,"शायद अकेला"
कुछ चले थे मेरे साथ, पूरी राह नापी थी उन्होंने
हाथ कसकर पकड़ा था मेरा ,किंतु जब राह खत्म हुई
तलवे जल गए थे, शरीर फट चुका था, निर्वस्त्र थे वो
चमड़ी भुन चुकी थी, गला फट चुका था, अंगुलिया टेढ़ी हो चुकी थी, दर्द, भावना, बिलाप, बिछड़न, की भभूति छाती में उड़ रही थी
किसी को भी वह यह दर्द नहीं बता सकता था
क्योंकि "वहअकेला था"
आवाज मजबूत थी, आंखों में चमक थी, मन में कोई संशय ना था, अंतरात्मा तृप्त थी, पीछे करोड़ों कीड़े जय गान कर रहे थे, परंतु "पीछे", वह तो अब भी "अकेला था"
कुछ चले थे साथ शुरू में, किंतु बीच में कांटे निकालने के बहाने से ठहर गए लेकिन वह फिर भी चलता रहा "अकेला"
इसलिए कहता हूं
तुम जाओ आनंदमयी जीवन जियो जैसा दुनिया जीती है. तुम इन छिटपुट लोगों की तरह पागल थोड़ी ना हो, जो मेरे साथ चलोगे आखिर जीवन का उद्देश्य आनंद ही तो है , जब पगला जाना तब मेरे पास आ जाना फिर साथ में चलेंगे। अभी तुम जाओ
मेरा क्या है मैं तो तब तक चलता रहूंगा "शायद अकेला"
तुम जाओ , छोड़ दो मेरा हाथ, रोक लो अपने कदम
तुम जाओ, जाने दो मुझे "अकेला"
तुम जाओ, किसी कुर्ते के पीछे वाले जमींदार के पास
मेरे नाम के कंगन गिरवी रख दो और उससे कुछ काले अक्षर ले लो
ठूंस लो उन्हें मुंह ह्रदय आत्मा की गहराइयों तक
चढ़ते जाओ फिर सफलता की सीढ़ियां, दम नहीं है किसी में रोक ले तुम्हें
मेरा क्या है, मैं तो चलता रहूंगा ,"शायद अकेला"
कुछ चले थे मेरे साथ, पूरी राह नापी थी उन्होंने
हाथ कसकर पकड़ा था मेरा ,किंतु जब राह खत्म हुई
तलवे जल गए थे, शरीर फट चुका था, निर्वस्त्र थे वो
चमड़ी भुन चुकी थी, गला फट चुका था, अंगुलिया टेढ़ी हो चुकी थी, दर्द, भावना, बिलाप, बिछड़न, की भभूति छाती में उड़ रही थी
किसी को भी वह यह दर्द नहीं बता सकता था
क्योंकि "वहअकेला था"
आवाज मजबूत थी, आंखों में चमक थी, मन में कोई संशय ना था, अंतरात्मा तृप्त थी, पीछे करोड़ों कीड़े जय गान कर रहे थे, परंतु "पीछे", वह तो अब भी "अकेला था"
कुछ चले थे साथ शुरू में, किंतु बीच में कांटे निकालने के बहाने से ठहर गए लेकिन वह फिर भी चलता रहा "अकेला"
इसलिए कहता हूं
तुम जाओ आनंदमयी जीवन जियो जैसा दुनिया जीती है. तुम इन छिटपुट लोगों की तरह पागल थोड़ी ना हो, जो मेरे साथ चलोगे आखिर जीवन का उद्देश्य आनंद ही तो है , जब पगला जाना तब मेरे पास आ जाना फिर साथ में चलेंगे। अभी तुम जाओ
मेरा क्या है मैं तो तब तक चलता रहूंगा "शायद अकेला"
Monday, September 24, 2018
पर्यावरण चीख रहा है,
अपनी शान शौकत विलासिता के लिए पर्यावरण की जितनी उपेक्षा हुई है, शायद ही किसी की हुई हो।निधड़क हमने धरती,पेड़,नदिया इन सबका अति उपभोग किया यहां तक कि हमने उन मूक जानवरो की भी परवाह नही की जो यहाँ जी रहे थे । गरुण ,गिद्ध, बाज़ चील काला हिरण लगभग समाप्त हो चुके है गोरैया जैसी प्यारी चिड़िया समाप्ति की कगार में है पर हमें क्या मनुष्य का धरती पर एकाधिकार समझ कर हम इसको निचोडने से बाज नही आ रहे आज स्थिति यह है कि मनुष्य जाति स्वयं खतरे में आ गयी है आनी भी चाहिए कर्म का फल अवश्य मिलता है। अब वक्त नही बचा यदि पर्यावरण संतुलित नही रहा तो दुनियां की सारी भोग विलासिता सारे ज्ञान भंडार धरे के धरे रह जाएंगे हाथ लगेंगा तो केवल कष्ट, संकट और मृत्यु। आज सरकार के भरोसे बैठने का समय नही है खुद शुरुआत करनी पड़ेगी हाथ जोड़कर निवेदन है जाग जाओ वारना जाग नही पाओगे।
मत मांगो मुझसे ओ साथी ,प्रेम गीत मैं दे ना सकूँगा पायल की छनछन प्रेमी का ,आलिंगन मैं दे ना सकूँगा
लिख न पाता सांझ सुनहरी ,जो तुमको सहलाती है
लिख कैसे दूं प्रेम भाव , जब फटती मां की छाती है
अगली पंक्ति में देखये हमने धरती के साथ क्या किया
तृष्णा चढ़ी कपार हमें , भू उदर फाड़ कर बैठे हैं
नोच लिया जी भरने तक,फिर धुनि रमा के बैठे है
छुड़ा लिया हर एक निवाला , जो उसने संजोया था
फिर सूट बूट धर ज्ञानी का रंग चढ़ा के बैठे है
शत वर्ष जिया जो पीपल उसकी बोटी खा कर बैठे है
काट आम की डाल, खगों की रोटी खा कर बैठेहै
गरुण गिध्द कोयल गोरैया ,है सबका अधिकार यहाँ
क्यों हम न्याय प्रणेता उनके घर उजाड़ कर बैठे हैं
मानव का सर्वोपरि जीवन , वेद पुराणों ने माना
भाव भरे दी वाणी प्रभु ने, बृह्म को हमने पहचाना
क्या पशुत्व जीवन की हमने राह चुनी है ?पता नही
मां वसुधा की सेवा में तैयार कर दिया तहखाना
इस भयावह समस्या से हम कैसे निपट सकते है
सुखी टहनी पर मैं फिर से पत्ते नए लगाऊंगा
रूठी कोयल मेरे घर से फिर से उसे मनाऊंगा
नन्ही गोरैया के हिस्से का दाना बनवाऊंगा
पग पग चल कर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
रूठी कोयल मेरे घर से फिर से उसे मनाऊंगा
नन्ही गोरैया के हिस्से का दाना बनवाऊंगा
पग पग चल कर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
मैं भारत की नई उम्र हूँ , और उम्र का जोश नया
पर धरती के तपते तन में, जल थोड़ा जो शेष बचा
शेष बचे जल को मैं फिर अपार समुन्द्र बनाऊंगा
पग पग चलकर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
पर धरती के तपते तन में, जल थोड़ा जो शेष बचा
शेष बचे जल को मैं फिर अपार समुन्द्र बनाऊंगा
पग पग चलकर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
टहनी टूटे क्षमा मांगने वाली प्रथा चलाऊंगा
चली कुल्हाड़ी अगर तने में इंक़लाब चिल्लाऊंगा
आंदोलन की मांग उठी तो चिपको फिर से गाऊंगा
पग पग चलकर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
चली कुल्हाड़ी अगर तने में इंक़लाब चिल्लाऊंगा
आंदोलन की मांग उठी तो चिपको फिर से गाऊंगा
पग पग चलकर क्षण क्षण अपना पर्यावरण बचाऊंगा
आप सबसे निवेदन है पर्यावरण बचाये।।
Thursday, January 25, 2018
समर
समर
है धरा जो शुष्क सी ,तड़प रही जो खेद से |
वीर आज बढ़ चलो ,हरित कर दो स्वेद से |
प्रण लिए स्वप्राण में ,धरो करो में खड्ग तुम |
जीत की जो प्यास मन में ,व्यर्थ न करोगे तुम|
सामने जो रण पड़ा है , यज्ञ की वो भूमि है |
इस समर में प्रण करो की अंत तक लड़ोगे तुम ||
ये समर जो व्योम में हुंकार कर के छाया है |
ये समर जो शक्ति का प्रतीक बन के आया है |
इस समर को बेधना आसान न पार्थियों |
इस समर में रक्त स्वेद ने विजय को पाया है |
रीढ़ सीधी कर गति से इस गली बढोगे तुम |
इस समर में प्रण करो की अंत तक लड़ोगे तुम।।
अग्नि
अग्नि का विकराल रूप
एक दैत्य देह विकराल कर के
हाथो मे अपने वो काल भर के
सन्मुख मेरे आ खड़ाहुआ
पर हाथ में मेरे नीर देख किंचित था शायद डरा हुआ|
पीत वर्ण ओढ़े भुज पर
रख लाल तेज अपने मुख पर
पग धीरे धीरे बढ़ा रहा
नाजाने
अज्ञात मन क्या गला |रहा
न्यून त्रास मन में क्यों जागा
नीर उड़ेलकर मैं क्यों भागा
प्रकृति की कसौटी थी या मेरा था अपराध
उस प्रलय का परिणाम मिला मुझे बड़ा अगाध||
अम्बु के स्पर्श मात्र यातुधान उछल पड़ा
क्रुद्ध होकर भयंकर जाने क्यों मचल पड़ा
विस्तार कलेवर करके अपना मुख कोपितहो भभक रहा
योजन भर का कर फैलाये पंख पसारे नभग रहा||
पीली चादर धारण करके तांडव में वो लींन हुआ
मुखसे अपने गगन चूमता कर विध्वंश विलीन हुआ
वृहद क्षेत्र के वन अरण्य को क्षण भर में वो समां गया
सारे नीति नियम सुख दुःख वो पल भर में ही कमा गया
अल्प समय विध्वंश नदी का वह तो एक नावक था|
वह निसिचर कोई और नहीं एक क्रोधित कोपित पावक था
अग्नि अनल कृशानु हुताशन नाम अनेक पावक ज्वलन
धूमकेतु वैश्वानर शुचि साथ लिया ज्वाला दहन
क्रोध लेकर यदि खड़ा हुआ विंध्य बचा न विदर्भ
दहक़ रहाहै इसके कारन गर्तमें बसा भूगर्भ
अल्प समय विध्वंश नदी का वहतो एक नावकथा
वह निसिचर कोई और नहीं एक क्रोधित कोपित पावक था|
सैनिक
सैनिक
– हमारी मतृभूमि को बाहरी शत्रुओ से संरक्षण प्रदान करने वाले वीर फौजी हमेशा कड़वे प्रसंगो के बीच घिरे रहते
है
है
इस बात से भारती माँ व्याकुल होकर उस से पूछ बैठती है क्या तुझे भय नहीं लगता और क्रोध नहीं अाता की
तेरे ही लोग तुझ पर ऐसे कड़वे प्रसंग करते है
क्या और किस पर उपकार कर रहा है तू। तेरा उपकार कोई नहीं मानता
इस पर उस वीर ने बड़ी सुंदरता तथा सहजता से उत्तर दिया
तेरे ही लोग तुझ पर ऐसे कड़वे प्रसंग करते है
क्या और किस पर उपकार कर रहा है तू। तेरा उपकार कोई नहीं मानता
इस पर उस वीर ने बड़ी सुंदरता तथा सहजता से उत्तर दिया
भय डर त्रास का विनाश करते बढ़ रहा हूँ।
शक्ति क्षीण हो ना पाए विचार करके लड़ रहा हूँ।
आँन मातृभूमि की संभाल करके चढ़ रहा हूँ।
मृत्यु सन्मुख मिथ्या है विचार मन में मढ रहा हूँ।
शक्ति क्षीण हो ना पाए विचार करके लड़ रहा हूँ।
आँन मातृभूमि की संभाल करके चढ़ रहा हूँ।
मृत्यु सन्मुख मिथ्या है विचार मन में मढ रहा हूँ।
उपकार नहीं भूमि का ऋण अदा करता हूँ
पीर ना पहुंचे देश को बस इसी बात से डरता हूँ। .
पीर ना पहुंचे देश को बस इसी बात से डरता हूँ। .
भय नहीं है मुझे मृत्यु की चीत्कार से
मुख धोये है मैंने मित्रो की रक्त धार से।
मुख धोये है मैंने मित्रो की रक्त धार से।
अश्रु न बहे मेरे नयन बड़े कठोर है
मृत्यु से डरू क्यों मै मृत्यु तो चहुओर है।
मृत्यु से डरू क्यों मै मृत्यु तो चहुओर है।
उपकार नहीं भूमि का ऋण अदा करता हूँ
पीर ना पहुंचे देश को बस इसी बात से डरता हूँ।
पीर ना पहुंचे देश को बस इसी बात से डरता हूँ।
शत वीरों ने शीश चढ़ाये शत ने शव में कफ़न दिए
शत ने शीश हिमालय में महाकाल को दफ़न किये
कुछ बहरूपी सर्प गर्त से वफादार बन उमड़ पड़े
भारत तेरे टुकड़े होंगे सुन कर भी चुप रहे खड़े।
शत ने शीश हिमालय में महाकाल को दफ़न किये
कुछ बहरूपी सर्प गर्त से वफादार बन उमड़ पड़े
भारत तेरे टुकड़े होंगे सुन कर भी चुप रहे खड़े।
मैं तो हमेशा कड़वे प्रसंगो का विषपान करता हूँ
माँ तेरी मर्यादा पर सवाल न उठे बस इसी बात से डरता हूँ।
माँ तेरी मर्यादा पर सवाल न उठे बस इसी बात से डरता हूँ।
सीमा लांघेगा यदि इस माटी की उसका विध्वंश कर दूंगा।
प्रिय कितना भी हो मेरा सारे सम्बन्ध तज दूंगा
किन्तु घर में पल रहे नांग ही मन को कचोटते हैं
तेरा ही पय पीकर तेरी छाती में लोटते हैं
प्रिय कितना भी हो मेरा सारे सम्बन्ध तज दूंगा
किन्तु घर में पल रहे नांग ही मन को कचोटते हैं
तेरा ही पय पीकर तेरी छाती में लोटते हैं
तू कितनी भोली है माँ जो पुँत्र समझ सब को गले लगाती हैं
व्यथा पीड़ा दुःख इनके देखकर तू क्यों अकुलाती है
ये सर्प बड़ा घातक है माँ विष फैन में रखकर रक्तपान करता है।
कही काट ना ले तुझे सोचकर पुत्र तेरा डरता है
व्यथा पीड़ा दुःख इनके देखकर तू क्यों अकुलाती है
ये सर्प बड़ा घातक है माँ विष फैन में रखकर रक्तपान करता है।
कही काट ना ले तुझे सोचकर पुत्र तेरा डरता है
प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती
ऐ दुष्टो इस देश में अगर तुम्हे बचने की क्षमता नहीं होती
ऐ दुष्टो इस देश में अगर तुम्हे बचने की क्षमता नहीं होती
मारे जाते तुम भी किसी आतंकी बारूदों से
फिर तुम्हे असहिष्णु दिखने वाली कोई जनता नहीं होती।
फिर तुम्हे असहिष्णु दिखने वाली कोई जनता नहीं होती।
संभल जाओ विशधारियो जला दो विष अपना अंगार में
ऊँगली अगली बार उठी यदि माँ पर
सर कट जाएंगे भीषण नरसंहार में। .
ऊँगली अगली बार उठी यदि माँ पर
सर कट जाएंगे भीषण नरसंहार में। .
भारत माता की जय , वन्दे मातरम।
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