सैनिक
– हमारी मतृभूमि को बाहरी शत्रुओ से संरक्षण प्रदान करने वाले वीर फौजी हमेशा कड़वे प्रसंगो के बीच घिरे रहते
है
है
इस बात से भारती माँ व्याकुल होकर उस से पूछ बैठती है क्या तुझे भय नहीं लगता और क्रोध नहीं अाता की
तेरे ही लोग तुझ पर ऐसे कड़वे प्रसंग करते है
क्या और किस पर उपकार कर रहा है तू। तेरा उपकार कोई नहीं मानता
इस पर उस वीर ने बड़ी सुंदरता तथा सहजता से उत्तर दिया
तेरे ही लोग तुझ पर ऐसे कड़वे प्रसंग करते है
क्या और किस पर उपकार कर रहा है तू। तेरा उपकार कोई नहीं मानता
इस पर उस वीर ने बड़ी सुंदरता तथा सहजता से उत्तर दिया
भय डर त्रास का विनाश करते बढ़ रहा हूँ।
शक्ति क्षीण हो ना पाए विचार करके लड़ रहा हूँ।
आँन मातृभूमि की संभाल करके चढ़ रहा हूँ।
मृत्यु सन्मुख मिथ्या है विचार मन में मढ रहा हूँ।
शक्ति क्षीण हो ना पाए विचार करके लड़ रहा हूँ।
आँन मातृभूमि की संभाल करके चढ़ रहा हूँ।
मृत्यु सन्मुख मिथ्या है विचार मन में मढ रहा हूँ।
उपकार नहीं भूमि का ऋण अदा करता हूँ
पीर ना पहुंचे देश को बस इसी बात से डरता हूँ। .
पीर ना पहुंचे देश को बस इसी बात से डरता हूँ। .
भय नहीं है मुझे मृत्यु की चीत्कार से
मुख धोये है मैंने मित्रो की रक्त धार से।
मुख धोये है मैंने मित्रो की रक्त धार से।
अश्रु न बहे मेरे नयन बड़े कठोर है
मृत्यु से डरू क्यों मै मृत्यु तो चहुओर है।
मृत्यु से डरू क्यों मै मृत्यु तो चहुओर है।
उपकार नहीं भूमि का ऋण अदा करता हूँ
पीर ना पहुंचे देश को बस इसी बात से डरता हूँ।
पीर ना पहुंचे देश को बस इसी बात से डरता हूँ।
शत वीरों ने शीश चढ़ाये शत ने शव में कफ़न दिए
शत ने शीश हिमालय में महाकाल को दफ़न किये
कुछ बहरूपी सर्प गर्त से वफादार बन उमड़ पड़े
भारत तेरे टुकड़े होंगे सुन कर भी चुप रहे खड़े।
शत ने शीश हिमालय में महाकाल को दफ़न किये
कुछ बहरूपी सर्प गर्त से वफादार बन उमड़ पड़े
भारत तेरे टुकड़े होंगे सुन कर भी चुप रहे खड़े।
मैं तो हमेशा कड़वे प्रसंगो का विषपान करता हूँ
माँ तेरी मर्यादा पर सवाल न उठे बस इसी बात से डरता हूँ।
माँ तेरी मर्यादा पर सवाल न उठे बस इसी बात से डरता हूँ।
सीमा लांघेगा यदि इस माटी की उसका विध्वंश कर दूंगा।
प्रिय कितना भी हो मेरा सारे सम्बन्ध तज दूंगा
किन्तु घर में पल रहे नांग ही मन को कचोटते हैं
तेरा ही पय पीकर तेरी छाती में लोटते हैं
प्रिय कितना भी हो मेरा सारे सम्बन्ध तज दूंगा
किन्तु घर में पल रहे नांग ही मन को कचोटते हैं
तेरा ही पय पीकर तेरी छाती में लोटते हैं
तू कितनी भोली है माँ जो पुँत्र समझ सब को गले लगाती हैं
व्यथा पीड़ा दुःख इनके देखकर तू क्यों अकुलाती है
ये सर्प बड़ा घातक है माँ विष फैन में रखकर रक्तपान करता है।
कही काट ना ले तुझे सोचकर पुत्र तेरा डरता है
व्यथा पीड़ा दुःख इनके देखकर तू क्यों अकुलाती है
ये सर्प बड़ा घातक है माँ विष फैन में रखकर रक्तपान करता है।
कही काट ना ले तुझे सोचकर पुत्र तेरा डरता है
प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती
ऐ दुष्टो इस देश में अगर तुम्हे बचने की क्षमता नहीं होती
ऐ दुष्टो इस देश में अगर तुम्हे बचने की क्षमता नहीं होती
मारे जाते तुम भी किसी आतंकी बारूदों से
फिर तुम्हे असहिष्णु दिखने वाली कोई जनता नहीं होती।
फिर तुम्हे असहिष्णु दिखने वाली कोई जनता नहीं होती।
संभल जाओ विशधारियो जला दो विष अपना अंगार में
ऊँगली अगली बार उठी यदि माँ पर
सर कट जाएंगे भीषण नरसंहार में। .
ऊँगली अगली बार उठी यदि माँ पर
सर कट जाएंगे भीषण नरसंहार में। .
भारत माता की जय , वन्दे मातरम।
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