अग्नि का विकराल रूप
एक दैत्य देह विकराल कर के
हाथो मे अपने वो काल भर के
सन्मुख मेरे आ खड़ाहुआ
पर हाथ में मेरे नीर देख किंचित था शायद डरा हुआ|
पीत वर्ण ओढ़े भुज पर
रख लाल तेज अपने मुख पर
पग धीरे धीरे बढ़ा रहा
नाजाने
अज्ञात मन क्या गला |रहा
न्यून त्रास मन में क्यों जागा
नीर उड़ेलकर मैं क्यों भागा
प्रकृति की कसौटी थी या मेरा था अपराध
उस प्रलय का परिणाम मिला मुझे बड़ा अगाध||
अम्बु के स्पर्श मात्र यातुधान उछल पड़ा
क्रुद्ध होकर भयंकर जाने क्यों मचल पड़ा
विस्तार कलेवर करके अपना मुख कोपितहो भभक रहा
योजन भर का कर फैलाये पंख पसारे नभग रहा||
पीली चादर धारण करके तांडव में वो लींन हुआ
मुखसे अपने गगन चूमता कर विध्वंश विलीन हुआ
वृहद क्षेत्र के वन अरण्य को क्षण भर में वो समां गया
सारे नीति नियम सुख दुःख वो पल भर में ही कमा गया
अल्प समय विध्वंश नदी का वह तो एक नावक था|
वह निसिचर कोई और नहीं एक क्रोधित कोपित पावक था
अग्नि अनल कृशानु हुताशन नाम अनेक पावक ज्वलन
धूमकेतु वैश्वानर शुचि साथ लिया ज्वाला दहन
क्रोध लेकर यदि खड़ा हुआ विंध्य बचा न विदर्भ
दहक़ रहाहै इसके कारन गर्तमें बसा भूगर्भ
अल्प समय विध्वंश नदी का वहतो एक नावकथा
वह निसिचर कोई और नहीं एक क्रोधित कोपित पावक था|
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